December 06, 2020

28.11.2020 (दरभंगा) : महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन, दरभंगा में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की 113 वीं जयंती समारोह आयोजित की गई। इस वर्ष कामेश्वर सिंह बिहार हेरिटेज सिरीज के अंतर्गत रासबिहारी लाल दास रचित "मिथिला दर्पण" का द्वितीय संस्करण जारी किया गया। कामेश्वर सिंह स्मृति व्याख्यान प्रख्यात इतिहासविद् प्रोफेसर रत्नेश्वर मिश्र, पूर्व विभागाध्यक्ष, विश्वविद्यालय इतिहास विभाग, ल० ना० मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा ने दिया।
प्रोफेसर मिश्र ने "राष्ट्रवाद का भारतीय संदर्भ : ऐतिहासिक आयाम" विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि "भूमण्डलीकरण के युग में राष्ट्रवाद पर चर्चा विडम्बनापूर्ण है किन्तु अप्रत्याशित नहीं, भारत औपनिवेशिक शासन काल में आधुनिक अर्थों में राष्ट्र का रुप ले सका, किन्तु अभी भी विद्वान इसे अप्राकृतिक राष्ट्र, बिना राष्ट्रीयता के राष्ट्र अथवा बहुराष्ट्रीय राज्य जैसी संज्ञाओं से अभीहित करते हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में 1885 से जब इसको राष्ट्रीय रुप दिया जाने लगा तो वह अभिजन तक सीमित रहा। किन्तु शीघ्र ही गांधी जी की अभ्युदय के बाद सामान्य जन भी इससे जुड़े। वैसे, जन चेतना में राष्ट्र किसी न किसी रूप में सैन्धव्य और वैदिक सभ्यता के समय से रहा, जिसे कई इतिहासकारों ने औपनिवेशिक संप्रभुता से भिन्न आंतरिक तथा आध्यात्मिक संप्रभुता की संज्ञा दी। भारत की अवधारणा वस्तुतः मात्र राष्ट्र या राज्य की नहीं है, बल्कि एक सभ्यता की है। और उस सभ्यता-सार को कई इतिहासकारों ने राष्ट्रीयता का प्राक् आधुनिक आधार कहा और कहा कि भारत एक भू-सांस्कृतिक क्षेत्र है न कि भू-राजनीतिक। भारत निश्चय ही एक ऐसा राष्ट्र है जिसे गांधी जैसे लोगों ने कहा कि जहां अपने लिए प्रेम है ही बल्कि दूसरे के लिए घृणा बिल्कुल नहीं है। भारतीय राष्ट्रवाद के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि इसके अंतर्गत बहुविध हित और आवाजें हैं। और इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी चुनौती परस्पर विरोधी सी दिखती आवाज़ों के बीच अंतर्निहित एकता की तलाश करना है। और उसमें सफलता मिलने में कठिनाई अनुभव हो तो विविधता का उत्सव मनाना भारतवासियों का उसी प्रकार कर्तव्य है जैसे आस्तिक हो या नास्तिक, वैष्णव हो या शैव-शाक्त सभी हिन्दू हैं। भारतीय संविधान लागू हो जाने के बाद भारत का प्रजातंत्र और उसकी संस्थाएं जैसे न्यायालय, वयस्क मताधिकार आदि बहुलवाद को सुलझाने के व्यवहारिक तरीके हैं।"
इस जयंती समारोह में 1932-1962 के मध्य राज दरभंगा द्वारा विभिन्न अवसरों पर फिल्माए गए 19 फिल्मों और हजारों फोटोग्राफ के आधार पर तैयार की गई फिल्म "दास्तान-ए-दरभंगा" प्रर्दशित की गई। इस फिल्म के माध्यम से मिथिला के भव्य अतीत का पता चलता है। इस फिल्म को श्री दीपेश चन्द्र और उनकी संस्था करुणेश फाउंडेशन, दरभंगा ने तैयार की है, जिसमें कई इतिहासकारों का सहयोग लिया गया, ताकि तिथि और तथ्य सही सही प्रर्दशित हो सके।
कार्यक्रम की शुरुआत भगवती वंदना से हुई। तत्पश्चात महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के चित्र पर माल्यार्पण कर स्मरण किया गया। आगत अतिथियों का स्वागत डॉ. मानस बिहारी वर्मा ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ रामचंद्र झा ने किया। मंच संचालन फाउंडेशन के कार्यकारी अधिकारी श्री श्रुतिकर झा ने किया।