December 06, 2019

28.11.2019 (दरभंगा) : केएसडीएसयू में आयोजित सातवें दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करते हुए सूबे के महामहिम कुलाधिपति सह राज्यपाल माननीय फागू चौहान ने गुरुवार को कहा कि भारत को फिर से जगतगुरु के रूप में प्रतिष्ठा दिलानी है तो संस्कृत का विकास जरूरी है। संस्कृत ज्ञान के अभाव में हम न तो भारत की सांस्कृतिक सम्पन्नता और विपुल ज्ञान सम्पदा से परिचित हो पाएंगे और न ही अपने राष्ट्र की भावनात्मक एकता को सुरक्षित रख पाएंगे। संस्कृत की संवृद्धि के लिए उसकी बहुमूल्य पांडुलिपियों के संरक्षण एवम उसके डिजिटाइजेशन पर बल दिया।
विश्व के ज्ञान विज्ञान के सम्पूर्ण विषय संस्कृत साहित्य में सुरक्षित है। उन्होंने संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा बताया। अपने सम्बोधन के क्रम में महामहिम ने संस्कृत विश्वविद्यालय के संस्थापक महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के प्रति श्रद्धा निवेदन किया और उनके संस्कृत शिक्षा प्रेम को भी नमन किया। उन्होंने कहा कि उपाधि ग्रहण करने वाले छात्रों के लिए आज का दिन उनके जीवन का स्वर्णिम अवसर है क्योंकि आज उन्हें अपनी साधना व परिश्रम का मधुर फल प्राप्त हुआ है। महामहिम ने सभी छात्रों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आशा जताई कि विश्वविद्यालय से अर्जित ज्ञान व संस्कार का उपयोग वे अपने जीवन के साथ साथ सम्पूर्ण मानवता के व्यापक कल्याण के लिए करेंगे। इस अवसर पर राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान , नई दिल्ली के कुलपति प्रो0 पी0एन0 शास्त्री ने कहा कि इन दिनों संस्कृत भाषा के प्रति कई जानी- अनजानी भ्रांतियां समाज मे फैल गयी हैं। इससे देववाणी को नुकसान हो रहा है। इसलिए जरूरत है संस्कृत में प्रतिपादित मौलिक विचारों को जनमानस तक पहुंचाने की। ताकि व्याप्त भ्रांतियां व आशंकाएं निर्मूल हो सके और संस्कृत भी निर्वाध गति से फल फूल सके।
साथ ही उन्होंने कहा कि संस्कृत में हो रहे शोध कार्यों से निकले नए नए तथ्यों को विभिन्न माध्यमों के जरिये देश-विदेशों में प्रचारित-प्रसारित करने की नितांत जरूरत है। इन माध्यमों में दूरदर्शन, इंटरनेट, पत्र पत्रिकाएं समेत अन्य संसाधनों का भरपूर उपयोग किया जा सकता है। अपने दीक्षांत भाषण को आगे बढ़ाते हुए प्रो0 शास्त्री ने संस्कृत विश्वविद्यालय को एक महत्वपूर्ण सुझाव यह दिया कि यहां से उपाधि प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए कम से कम एक पांडुलिपि के संशोधन, प्रकाशन, मुद्रण या फिर सम्पादन की अनिवार्यता सुनिश्चित कर देना चाहिए। इस प्रयास से दुर्लभ ग्रन्थों का प्रकाशन हो सकेगा और जो पांडुलिपियाँ पंडितों के घरों में, पेटियों में, पुस्तकालयों में जैसे तैसे पड़ी हुईं हैं या कैद हैं उसे पुनर्जीवन मिलेगा। इस समारोह के अवसर पर संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 सर्व नारायण झा ने विकास प्रतिवेदन पेश करते हुए कई उपलब्धियां गिनायीं और कहा कि समुचित विकास के लिए यहां रोज नए प्रयोग व प्रयास जारी है।
सत्र नियमित करने, छात्र हित में सुलभ छात्रवृत्ति के नियमों में सुधार, समय पर छात्र संघ का चुनाव, करीब दो दर्जन संगोष्ठीव कार्यशाला आयोजित करने, एनएसएस के विविध कार्यक्रमों को सम्पादित करने, शास्त्रार्थ सभा का आयोजन होने, शिक्षकों की नियुक्ति, विद्वानों के विशेष व्याख्यानों को यूट्यूब पर अपलोड करने, पवन एवम तर्पण विधि पर लाइव कार्यक्रम कर जनमानस के लिए इसे उपलब्ध कराने, उपाकर्म विधि पर पुस्तक का प्रकाशन कर निःशुल्क वितरण करने, नैड में पंजीयन कराने समेत ढेर सारे किये गए कार्यों को गिनाया। इसी क्रम में कुलपति ने बताया कि दीक्षांत समारोह पहले समावर्तन संस्कार के नाम से प्रसिद्ध था। उस समय मे ही जो उपदेश दिए जाते थे वही आज भी दिए जा रहे हैं। मानना तो यह है कि इस संकल्प से , वर्णभेद, आतंकवाद, वर्गभेद, क्षेत्रभेद, भ्रष्टाचार विरोधी भावना को दूर करने में मदद मिलती है।
उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ श्री निशिकांत ने बताया कि प्रतिकुलपति प्रो0 चन्द्रेश्वर प्रसाद सिंह ने संस्कृत में आगत सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। गौतलब है कि महामहिम कुलाधिपति ने करीब दो दर्जन भर कार्यों के लिए आधारशिला रखी।